2 कविता जो मां को खुश कर दे !
1: शीर्षक: मां का मुस्कान // कविता
"माँ" के मुस्कान को लाने मे और साल भी बीत गए, पापा को सम्मान दिलाने में कि माँ - पापा भी बूढ़े हो गए आशा अब भी बाकि है।
कि तेरी सांसों का कोई भरोसा नहीं मत देख "माँ" अब तू राह मे
री, मैं भवसागर में फंसा हुआ कोशिश है, जल्दी आऊंगा तेरे सपनो को भी लाऊंगा,
सब चिंताओ को त्याग दे "माँ" मेरे आने तक रुक जाना "माँ"
2. शीर्षक: चुप है, मां। // ये मेरा भी फेवरेट है !
"चुप है मां" (शीर्षक)
चुप है मां, पर मन में भारी बोझ लिए, थकी आंखों में उम्मीदों की जोत लिए। झुकी कमर, कांपते हाथ, फिर भी रसोई में खड़ी, कहती है - "बेटा, सब ठीक है..." जैसे कुछ हुआ ही नहीं।
घर में और भी हैं, जवान और स्वस्थ, पर नींद और आराम की दीवारें बहुत मजबूत हैं। कुछ लोग चैन की नींद में दिन बिताते हैं, और मां जलती है रोटियों के धुएं में अकेले।
मैं देखता हूं, मन करता है कुछ कह दूं, पर डरता हूं - कहीं घर की शांति न बहक जाए। कहीं रिश्तों की दीवारें दरक न जाएं, कहीं मां फिर कह न दे "चुप रह बेटा, बिखर जाएगा घर..."
मैं भी चाहता हूं मां की मदद करना, पर पढ़ाई का बोझ है- जिम्मेदारी बनकर सर पर। फिर भी जब मां को झुके हुए देखता हूं, किताबें छोड़कर उसके पास चला आता हूं।
रोटियों में हाथ बंटाता हूं, कभी झाडू, कभी बर्तन, मां को थोड़ा राहत दिलाता हूं। मां कुछ नहीं कहती, पर उसकी आंखों में एक सुकून होता है, जैसे कह रही हो - "तू ही है मेरा सच..."
पर क्या घर वो नहीं जो सबका हो? जहां प्यार हो, सम्मान हो, इंसाफ़ हो? क्या एक औरत की चुप्पी ही त्याग कहलाती है? या उसका शोषण समाज की मर्यादा बन जाती है?
मां को देवी कहा, फिर बोझ क्यों बना दिया? और जो साथ रहते हैं, उन्होंने नज़रें क्यों मोड़ लिया? आराम हक़ है, पर मदद फ़र्ज़ भी है, इंसानियत वहीं है जहां बराबरी की गुंजाइश भी है।
आज नहीं तो कल आवाज़ उठानी होगी, मां के हाथों से छाले हटाने होंगे। बचाना है तो अन्याय के ख़िलाफ़ बोलो, का रिश्ते तो रहेंगे - पर मां नहीं होगी...

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